Poetry

मेरा कमरा और गिटार By Ashish Prakash

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कुछ साल हुए कुछ धूल सी है
अब एक ख़ामोशी शूल सी है

कमरा ख़ाली ख़ाली है
एक बाग़ बिना किसी माली है

न हवा कोई न बहार कोई
एक शिथिल सा पड़ा गिटार कोई

एक कोने में यूँ बैठा सा
कोई दोस्त पुराना रूठा सा

कई साल हुए था अकेला वो
कई बार बहुत कुछ झेला वो

कई रात जगा मेरे साथ में वो
रोया भी मेरे जज़्बात में वो

कई दोस्त पुरानो को जाने
उनके भी सुख दुःख पहचाने

कई महफ़िल के हम साथी थे
हर बेगाने के बाराती थे

कई जाम भी हमने साथ लिए
और एक जैसे हालात लिए

हम एक दूजे के पूरक थे
हम दो थे पर हमसूरत थे

किसी लड़की को जब पटाया था
ये यार बहुत काम आया था

फिर वक़्त बढा मैं भी न रुका
संघर्ष उठा मैं भी न झुका

एक दौड़ हुई बस दौड़ पड़ा
गिटार वहीं पर मौन खड़ा

अब उम्र चली कुछ धूल दिखिं
कुछ ज़ुल्फ़ सफ़ेद और भूल दिखीं

न महफ़िल ना अब यार कोई
न दोस्त कोई न प्यार कोई

अब वो भी सच में अकेला था
अब कहाँ कोई यहाँ मेला था

एक कमरे में दो यार थे बस
पड़े कोनो में बेकार थे बस

चलो आज फिर तुम्हे उठाता हूँ
कोई धुन फिर नयी सजाता हूँ

मत सोचना कि बस गिटार है तू
मेरा साथी सच्चा यार है तू

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