Poetry

आख़िर क्यूँ ?- By Anupam Mithas

 

क्यूँ तुम मुझे इस दुनिया में आने नहीं देते?
आ जाऊँ तो फिर खुल कर साँस नहीं लेने देते।
क्यूँ हूँ मैं माँ बाप के लिए बोझ?
क्यूँ नहीं बदली अब तक समाज की सोच?
क्यूँ हूँ मैं बेटी होकर भी पराई?
क्यूँ हूँ मैं बहु होकर भी पराई?
चाहे कितनी भी मैं करलूँ पढ़ाई,
किसी को भी मेरी क़ाबिलियत समझ नहीं आई।
क्यूँ नहीं मुझे सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाई?
क्यूँ आज भी दिन के उजाले में,
ख़ुद को महफ़ूज़ नहीं समझ पाई।
क्यूँ मेरे सम्मान और अधिकार की नहीं हो रही सुनवाई?
हो रही है आज समाज में उत्थान की पोताई,
क्यूँ पतन ने ही मेरे अस्तित्व को ही चोट पहुँचाई?
क्यूँ जीवन की अग्नि परीक्षा मेरे हिस्से ही आई?
क्यूँ मैं अन्नपूर्णा , सरस्वती और जननी होकर भी जीवन के चक्रव्यूह से ना ख़ुद को बचा पाई?
क्यूँ और कैसे करेगा यह समाज मेरे हर मान हनन की भरपाई ?
क्यूँ इन द्रवित आँखों की पीड़ा किसी को समझ नहीं आई?
दिल में उठ रहे हर सवाल का उत्तर ख़ुद नारी नहीं ढूँढ पाई।
आज मैंने अपने दिल की बात कहने के लिए है क़लम उठाई,
आजतक क़लम की ताक़त ही सोते हुए अंतर्मनो को है जगा पाई।

🖋अनुपम🖋

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21 thoughts on “आख़िर क्यूँ ?- By Anupam Mithas”

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