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क्यों कृष्ण खड़े तुम एकाकी by Ashish Prakash

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हे कृष्ण खड़े तुम एकाकी
क्यों कृष्ण खड़े तुम एकाकीक्यों वृंदावन को छोड़ के तुम, द्वारकाधीश बने हो इठलाते ?
क्यों मीठी यमुना छोड़ के तुम, खारे पानी में बस जाते?क्यों मात यशोदा त्याग के तुम हो गए  थे मथुरा के प्यारे ?
क्यों ढूंढ तुम्हे हुए अशुरित नयन इन सखी गोपियाँ के सारे ?क्यों ठुकराके राधा के नयन, रुक्मणि के बन बसे  तुम स्वामी ?
क्यों आन पड़ा तेरे द्वार उसे, न स्वयं सुदामा सुध जानी ?

क्यों रोक न पाए ध्रुतक्रीड़ा  और अभिमन्यु की वीरगति ?
क्यों दुर्योधन और शकुनि की नहीं पावन  की विशुद्ध  मति ?

क्यों प्रेम की बंसी छोड़ के तुम, हो चक्रधारी भगवान् बने ?
क्यों सारथि बन अर्जुन के तुम, युद्ध का यूँ सामान  बने ?

क्यों दुनिया तुमने प्यार के मोल में युद्ध से थी कमतर आंकी?
इसलिए खड़े तुम एकाकी
क्यों कृष्ण खड़े तुम एकाकी?

हमने माना जब तुमको  तब जाके तुम  भग्वान हुये
केहि कारज न बन् सके मित्र प्रभु, क्यु न बस् घन्श्याम् हुये

तुम लीला के लीलाधर थे, फिर् क्यों महाभारत सन्हार् रचा
तुम काल भी थे तुम् कर्म् क्ष्रेश्त् फिर् क्यों तुम्ने वह् काल् रचा

तुम जिस राधा के प्रेमी हो, जिस प्रेम की थी  मीरा प्यासी
उसी प्रेम के हो ईश प्रभु , उसी रूप में पूजा की जाती

राधा के बिन नहीं श्याम कहीं, बस देखने एक दिन आ जाओ
राधे राधे ही सुन घूमो, और मीरा गिरधर कहलाओ

प्रेम में पड़ के आज भी नीतिवन तुमको है याद करे
प्रेमपाश में बंधी  गोपियों  संग  अब भी  बृजपाल  खड़े

मंदिर मंदिर तेरी मूरत में बस्ती राधा रानी
क्यों छोड़ फिर  बृज चले गए , क्यों मथुरा को नगरी मानी

प्रभु मूरत मे दोश नहीं पर भग्वन हैं तोे प्रश्न सुने
क्यों त्यागा माता सीता को, क्यों प्रेम को तज तुम राज चुने

जब भगवन है तो भक्त भी हैं, और भक्तों को  अधिकार भी है
जो तज  के प्रेम पा लिये तुम विश्व, तो विश्व तो ये बेकार ही है

तुम प्रेम के सच्चे भगवन हो, हैं प्रेम  तुम्हारी  बस झांकी
इसलिए खड़े तुम एकाकी
क्यों कृष्ण खड़े तुम एकाकी?

-आशीष प्रकाश सक्सेना

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