Poetry

मेरे अंतर्मन में एक निर्भया by anupam mithas

मेरे अंतर्मन में
एक निर्भया,
एक आसिफ़ा रहती है।
नित मेरे अंतर्मन को झँझोड़ती हैं।

क्यूँ हम इतनी लज्जित सी?
क्यूँ इतनी दंडित और खंडित सी?
क्यूँ हमारी आत्मा इतनी पीड़ित सी ?
मैं उनको अपने साये में सुलाए रहती हूँ।

यह जो खड़े इतने सवाल हैं,
यह जो मचे इतने बवाल हैं।
क्यूँ हमारी ज़िंदगी बनी
हैवानियत की बलिदान है?

बचा सको तो बचा लो
अब हर निर्भया, हर आसिफ़ा को
जो इस ज़ालिम जहाँ में मौजूद है।

अब इक पीड़ादायक त्रासदी को
देना एक अंतिम पड़ाव है।

उतार फेंको हैवानियत का
जो चढ़ा इंसानियत पे नक़ाब है।
देना हर एक को हमको जवाब है।

मेरे अंदर की निर्भया और आसिफ़ा के सवाल
बेहिसाब हैं।
ढूँढ नहीं पा रही क्यूँ मैं कोई जवाब?
ना जाने कब हल होंगे यह जो सवाल हैं।
🖋अनुपम🖋

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