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माँ

अम्मा से माँ और माँ से मदर हो गई,
जब लडखडाए कदम कभी, उंगलियाँ थाम  के फ़ादर हो गई .
ज़िन्दगी की धूप , ज़माने की तपिश से बचा रहा मै ,
आँचल उसका मानो ,बादलों की चादर हो गई,
होंठो पे मुस्कान,गरल में हलाहल रहा,
पर मेरी हर प्यास में वो,
अमृत का गागर हो गई
हर रंज , गम ,गुस्सा अपने अंदर समेट कर भी,
आश्चर्य !! वो इक मीठा सा सागर हो गई,

जब देना चाहा, ईश्वर ने मेरी हर दुआ का जवाब,

बनाया जिसे,धरती पे, वो हमारी माँ हो गई. !!

नवाब”सैम”

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