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बेहतर सोच,बेहतर समाज का निर्माण By Sapna

आज हमारा समाज ना जाने किस घोर संक्रमणता से गुज़र रहा है। संक्रमणता किसी ख़ास शारीरिक रोग से नहीं अपितु मानसिक तौर से है। शारीरिक अपंगता का किसी न किसी प्रकार इलाज़ सम्भव है,किन्तु जो लोग मानसिक स्तर पर अपंग हो चुके है उनका क्या इलाज़ है? मानसिक अपंगता स्त्री को एक मामूली और तुच्छ वस्तु समझने की।

लगातार आये दिन बच्ची,औरते ,बुजुर्ग महिला से बलात्कार,छेड़खानी जैसे जंघय अपराध पैर लगातार फैला रे है। हमारे समाज की कोई भी महिला बुलन्द आवाज़ में नही कह सकती कि हम आजाद भारत में अपने आप को आज़ाद और सुरक्षित महसूस करती है और कहेंगी भी कैसे ? हमने उन्हें ऐसा माहौल दिया कहाँ है?
मैं उस समाज से पूछती हूँ कि क्या हमारे समाज का हर परिवार स्त्री जाति को लेकर सुरक्षित महसूस करता है ? बहन,बेटी,बहु,माँ के घर पहुँचने में पाँच मिनट भी देरी हो जाये तो हमे उनके लिए हजारों अनहोनी शंकाये घेर लेती है। क्या ऐसे ही जियेंगे आप और हम डर,शंका और चिंता के सायें में?
जिन ओरतों या लड़कियों के साथ बलात्कार या छेड़खानी होती है,मानसिक स्तर पर वह और उसका परिवार अपने आप को दोषी मानने लगते है और धीरे-धीरे परिवार और पीड़ित लड़की हज़ार तरह के ख़ुद पर पाबंदी लगा लेते है। कोई परिवार या समाज यह नही कहता कि- जो अनहोनी घटना या गलत व्यवहार तुम्हारे साथ हुआ उसका हमारी या तुम्हारी इज्ज़त से कोई वास्ता नही है। तुमको किसी से डरने की या ख़ौफ़ में जीने की जरूरत नही है। ये तुम्हारी जिंदगी है इसे खुल कर जियो,हम बस तुमको शसक्त और ख़ुश देखना चाहते है। समाज या परिवार को ऐसे माहौल बनाने की आवयश्कता है।
इसके उलट हमारा समाज बलात्कार,छेड़खानी की शिकार हुई या तलाकशुदा औरत को हीन दृष्टि से देखते है और समाज या परिवार उनको बोझ समझने लगता है बल्कि उनके साथ सामान्य व्यवहार करने की जरूरत है। उनके जीवन में घटित एक घटना जो आकस्मिक है इसकी सज़ा हम उनको ताउम्र ताने के रूप में देते है और जो अपराधी है वह आदर और सम्मान का पात्र बना रहता है कैसी विडंबना है ये समाज की?
धीरे-धीरे ही सही समाज और परिवार इन अपराधों को अपराध के रूप में देखने लगें है किन्तु ज़मीनी स्तर पर हालात में सुधार होना अब भी बाकि है।
🖊 सपना सिंह

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