Poetry

रात उसके ख्वाब से निकलना भारी हो गया By Dinesh Chauhan

इश्क़ मे इज़्तिराब से निकलना भारी हो गया…
रात उसके ख्वाब से निकलना भारी हो गया…

इक दिन, एक सवाल तो कर लिया था उससे
फिर उसके जवाब से निकलना भारी हो गया…

नूर उसके चेहरे का देख है तारे भी हैरत मे
फ़लक मे महताब से निकलना भारी हो गया…

इक भँवरा उड़के जा तो बैठा फूल पे मगर
गुल -ए-गुलाब से निकलना भारी हो गया…

देखा जिसने भी बे-नक़ाब वो जाँ दे बैठा
हुँसन का नक़ाब से निकलना भारी हो गया…

शाम एक जाम उसकी याद मे क्या पी लिया
सुरूर-ए-शराब से निकलना भारी हो गया…

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2 thoughts on “रात उसके ख्वाब से निकलना भारी हो गया By Dinesh Chauhan”

  1. Writing like yours inspires me to gain more knowledge on this subject. I appreciate how well you have stated your views within this informational venue.

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