Poetry

मन के खाली दर्पण में By Jagdeesh Meena

मन के खाली दर्पण में बस तेरा रूप निहारूँ मैं,
चाँदी से उजले ललाट पर बिखरी ज़ुल्फ़ संवारूँ मैं l

तुम जीवन के अँधकार में उतरी आज चाँदनी बन
मन के उपवन में छाई हो तुम तो मधुर रागिनी बन

भँवरा बन गुँजार करूँ तेरी मुस्कान निखारूँ मैं
मन के खाली दर्पण में……

पहन के पायल तू जिस राह से, मेरे यार गुज़र जाए
तेरी पायल की रुनझुन बन कर संगीत बिखर जाए

फिर बयार के साथ तुम्हारी, निस दिन राह बुहारूँ मैं
मन के खाली……………………।

बार बार यादों के पंक्षी आकर कलरव करते हैं।
मेरे सूने घर आँगन में रंग गमों के भरते हैं।।

बिन सावन के ही पपिहे सा, पल पल तुझे पुकारूँ मैं
मन के खाली दर्पण में…………………..

मेरी धड़कन मेरी तड़पन मेरी सिसकन शोर करे।
तन्हाई में अश्रुपात भींगी पलकों की कोर करे।।

डगमग डगमग करते स्वर में, कैसे दर्द उभारूँ मैं
मन के खाली दर्पण में…………………..

जगदीश मीणा

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