Poetry

हर निसाबों में मिलते हैं By Ranjeet Thakur

Know Ranjeet

अब वो हर वरक़, हर निसाबों में मिलते हैं।

अब वो पास नही आते ख़्वाबों में मिलते हैं।।

वो मिले, बिछड़े और अब अग्यार हो गयें।

उनके दिए गुलाब अब सिर्फ किताबों में मिलते हैं।।

ए ख़ुदा एक जमाना था, जब वो बेेपैरहन भी मिलते थे।

जाने क्या माजरा है, अब वो हिजाबों में मिलते हैं।।

तब तो मैं भी मदहोश था मकतबे इश्क़ में।

अब वो नशा सिर्फ शराबों में मिलता है।।

सुनो, कभी आ कर देखो शामें-गरीबाँ की।

यहाँ हर बारात, जनाज़ों में मिलते हैं।।

 

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