Poetry

रिश्ते By Sandeep Dutta

 

बन्धु, सखा, मित्र, दोस्त,
यार, रिश्तेदार, रहबर, दिलबर,
सुना है सभी के होते हैं…।

ये केवल मात्र शब्द हैं,
या फिर, ये रिश्ते सिर्फ,
कहने को ही होते हैं…?

दिन के उजाले में ये रिश्ते,
दिखते हैं पर, रात को ये सोते हैं,
जाने कहाँ तब ये होते हैं…।

नज़र नहीं आते, आवाज,
देने पर भी, पर चित्रों में,
ये साथ खड़े होते हैं…।

जब अंधेरा घना हो जाता है,
हाथ को हाथ नहीं सूझता है,
तब साया भी साथ छोड़ जाता है
तब कोई तो पास खड़ा होता है…।

वही होता है पास खड़ा,
जो अकसर चित्रों में,
साथ हमारे नहीं होते हैं…।

स्वार्थ में ही कुछ इंसान,
जीते हैं और स्वार्थ में ही,
वे जीवन गंवाते हैं…।

कहने को तो,आसतिक हैं,
धार्मिक हैं पर, ख़ुदा से भी,
वे चतुराई करते हैं…।

इष्ट को कुछ अर्पण,
करने से पहले, अपनी मांग,
को वे पहले पुख़्ता करते हैं…।

एक दिन वो भी समा जाते हैं
इसी माटी में बिखर कर,
शिखर पर जो रहते हैं…।

प्रभुत्व के मद में जो,
रहते थे कल तक, वो भी,
कालकवलित होते हैं…।

बन्धु, सखा, मित्र, दोस्त,
यार, रिश्तेदार, रहबर, दिलबर,
सुना है सभी के होते हैं…।

ये केवल मात्र शब्द है,
या फिर, ये रिश्ते सिर्फ,
कहनें को ही होते हैं…??

सन्दीप दत्ता –

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9 thoughts on “रिश्ते By Sandeep Dutta”

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