Poetry

सब बैठे एक डाली हैं By Ashish Prakash

Know Ashish

आज लगाता गले उसी को
जिसको देता गाली है
देखो कउआ देखो अजगर
सब बैठे एक डाली हैं

कोई कहे तुम शहज़ादे हो
कोई तो जुमलेबाज कहे
सबकी बस एक ही ख़्वाहिश है
अपने सर पे ताज रहे

एक डाल ही बैठ के करते
राज पेड़ पर बारी से
सब पक्षी और जीव हैं वाक़िफ़
इनकी हर मक्कारी से

कौन कहे खुल के कि वादें
दोनो के ही जाली हैं
देखो कउआ देखो अजगर
सब बैठे एक डाली हैं

फिर भी चुनते हैं वो अजगर
या कउआ, जो चल जाए
मरने वाले जीव मरेंगे
जाना हो तो कल जाए

अजगर का क़ब्ज़ा है पूरा
डाल न ऐसे छोड़ेगा
कउआ भी शाना है अपना
चौकड़ी इसकी तोड़ेगा

पेड़ के बाक़ी पंछी ख़ुश हैं
ख़ूब तमाशा जमता है
लोकतंत्र जब से है आया
मनोरंजन न थमता है

मान्सून का सत्र तभी तक
जब तक सब हरियाली है
देखो कउआ देखो अजगर
सब बैठे एक डाली हैं

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8 thoughts on “सब बैठे एक डाली हैं By Ashish Prakash”

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