Poetry

सखी By Braj Bhushan Roohdar

कोई न समझे पीर पराई
का से कहूँ मैं हाल सखी
लूट ले गया दिल वो मेरा
हो गयी मैं कंगाल सखी

मान मेरी तू इश्क़ न करियो
जी का है जंजाल सखी
रूहदार बिन पल-पल मेरा
बीते जैसे साल सखी

बिसराया है मुझको उसने
करे कभी न याद सखी
किस हरजाई के चक्कर में
हो गयी मैं बर्बाद सखी

अब तो मुझसे नहीं सम्भलता
जोबन का ये भार सखी
गंगा तीरे बैठी हूँ मैं
साजन है उस पार सखी

न कुछ बोलूँ न सुन पाऊँ
इस हद तक हूँ लाचार सखी
कहती मेरी विरह कहानी
बहती अँसुअन की धार सखी

पी को देखूँ सुबहा होवे
पी से होवे शाम सखी
पी को भजूँ मैं पी को ध्याऊँ
और न कोई काम सखी
– रूहदार

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