Poetry

कल गुज़री थी वहाँ से By Anupam Mithas

कल मैं गुज़री थी वहाँ से
यहाँ तामीर किया था तुमने सपनों का महल
हाँ वो अपने सपनों का महल,
जो सूखी मिट्टी का था
एक कमरा और वो छत जहाँ रखा हुआ था एक मचिस का बिस्तर
ढूँढा बहुत वो माचिस का बिस्तर,
शायद कहीं खो गया
वक़्त की रेत के ढेर में कहीं दब गया ,
बहुत मिट्टी को कुरेदा,
वो छत ,
वो कमरा शायद हालात की आँधी में ढह गया,
अता पता जो तुमने दिया था,
उस घर की निशानदेही में काम ना आया ,
हाँ अब इतना पता चला है कि उस सपनों के महल को कोई परदेसी अपनी किताबों में छुपा कर ले गया ,
वो मचिस का बिस्तर भी आँचल में बाँध के ले गया ,
गर फिर किसी चौराहे पे मिलेंगे तो सुस्ता कर अदरक की चाय का मज़ा ज़रूर लेंगे
हाल चाल पूछ कर ,
उस सपनों के महल का नया नक़्शा त्यार करेंगे,
थकान को दूर कर फिर उस गली के नुक्कड़ पे इक नया महल उसार लेंगे ।
उम्र का चाहे कोई भी पड़ाव हो,
तुम चाहे हमें ना पहचान पायो
हम तुम्हें तुम्हारी आवाज़ से पहचान लेंगे ।
🖋अनुपम मिठास 🖋

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31 thoughts on “कल गुज़री थी वहाँ से By Anupam Mithas”

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