Poetry

साढ़े सात बजे By Satlaj Rahat Indori

Know Satlaj Indori

सामने वाले रूम के परदे ..रोज़ हिलते हैं साढ़े सात बजे
दिन गुज़रता है ख़ाक ओढ़े हुए …फूल खिलते हैं साढ़े सात बजे

एक लड़का जो मेरे जैसा है एक लड़की तुम्हारे जैसी है
मैंने देखा है अपनी आँखों से …. रोज़ मिलते हैं साढ़े सात बजे

रोज़ जब वक़्त-ए-शाम होता है…दर्द का एहतिमाम होता है
याद आती है तेरी सात बजे .. ज़ख़्म छिलते हैं साढ़े सात बजे

कुछ नए हैं तो कुछ पुराने हैं ….शहर में किस क़दर ठिकाने हैं
चल कहीं चाय वाय पीते हैं …आज मिलते हैं साढ़े सात बजे

धूप में पत्थरों को तोड़ के हम .. इस बदन का लहू निचोड़ के हम
शाम होते ही प्यार करते हैं .. गले मिलते हैं साढ़े सात बजे

#सतलज_राहत

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359 thoughts on “साढ़े सात बजे By Satlaj Rahat Indori”

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