Poetry

सनम By Muskan Madhuri

ख़्वाब में अब न आना ऐ मेरे सनम
भूल मुझको ही जाना ऐ मेरे सनम

नाम मेरा लिखा तुमने जो हाथ पर
उसको अब तुम मिटाना ऐ मेरे सनम

कह न पाए कभी तुमको जो मेरे लब
सब समझ खुद ही जाना ऐ मेरे सनम।।

खाईंथी जो कसम जो थे वादे किये
भूलकर मत निभाना ऐ मेरे सनम।

बात जो तर्क की इक दूजे में थी
बात वो भूल जाना ऐ मेरे सनम

हद से बेहद तुम्हैं चाहता है ये दिल
चाहे जब आजमाना ऐ मेरे सनम

रुख पे मुस्कान जो वस्ल की रात थी
हॉ उसे फिर सजाना ऐ मेरे सनम

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9 thoughts on “सनम By Muskan Madhuri”

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