Poetry

मैं अपने मन का विद्रोही By Ashish Prakash

Know Ashish

मैं अपने मन का विद्रोही
रोज़ पटल पर फिरता हूँ
ये बैरागी मन क्या चाहे
बस इक्षाएँ गिनता हूँ
मैं अपने मन का विद्रोही

नितदिन खड़ा रहूँ चौराहे
क्या रस्ता लूँ न जानू
कहे जीवनी राह मुद्रा की
मन कहे न जा न मानू
रोज़ बढ़ाता हूँ क़दमों को
रोज़ लड़खड़ा गिरता हूँ
मैं अपने मन का विद्रोही
रोज़ पटल पर फिरता हूँ
मैं अपने मन का विद्रोही

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4 thoughts on “मैं अपने मन का विद्रोही By Ashish Prakash”

  1. When I initially commented I clicked the “Notify me when new comments are added” checkbox and now
    each time a comment is added I get three e-mails with the same comment.
    Is there any way you can remove me from that service? Many thanks!

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