Poetry

मैंने सीने में उठा ये बवंडर देखा By Vaibhav

Know Vaibhav

मैंने सीने में उठा ये बवंडर देखा
कलम की जगह हाथों में ये खंजर देखा

आज बस लिखता रहा मै अपनी बाते
फिर अंदाजे लिखावट का बदलता मंजर देखा

ये लगाव नहि था मेरा अपनी जड़ो से
उठा हि नहि औऱ मरते जमीर को अंदर देखा

अफसोस हुआ फिर भी खामोश रहा मैं
लहरो के बीच एक शान्त समंदर देखा

वो मेरे आगे सड़क पे दम तोड़ता रहा
और मेरी आँखों ने मेरी इनसानियत का बंजर देखा

कहते है इश्क और जंग मे सब जायज है
पर जायज़ जंग नहि इश्क़ है ये अंतर देखा

रहा बस ये गुमा कि सब दोस्त है मेरे
लगा जब पीठ पे पत्थर न पलट कर देखा

कभी जो लेट के पाली थी ख्वाहिशे ऊचाइयों के
उस उचाईयो पे पहुच कर नहि बिस्तर देखा

उसे रोक लेने कि ये साजिश थी मेरी
और हाथों में हाथ को दुनिया ने प्यार का अंबर देखा

वैभव

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2 thoughts on “मैंने सीने में उठा ये बवंडर देखा By Vaibhav”

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